““अहंकार” केवल राम-रावण युद्ध की कथा नहीं है, और न ही यह मात्र काव्य की पुस्तक है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले उस गहरे संघर्ष की अभिव्यक्ति है, जहाँ शक्ति और संयम, ज्ञान और विनम्रता, तथा “मैं” और सत्य आमने-सामने खड़े होते हैं।
इस कृति में रावण केवल एक पात्र नहीं, बल्कि उस चेतना का प्रतीक है जो उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचकर स्वयं को ही अंतिम सत्य मान बैठती है। उसका पतन यह याद दिलाता है कि जब बुद्धि से विनम्रता अलग हो जाती है, तब विनाश निश्चित हो जाता है।
राम भी यहाँ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं। वे उस मर्यादा, धैर्य और करुणा के प्रतीक हैं, जो बताते हैं कि सच्ची विजय शक्ति से नहीं, बल्कि सत्य और संयम से प्राप्त होती है।
“अहंकार” केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं,
यह स्वयं को पहचानने की एक यात्रा है।”







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